शांतिपूर्ण विरोध पर रोक से लोकतंत्र पर सवाल, गीतांजलि श्री ने उठाई आवाज
दिल्ली में मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ प्रदर्शनों को लेकर वरिष्ठ साहित्यकार गीतांजलि श्री ने जताई चिंता, शांतिपूर्ण प्रतिरोध को लोकतंत्र का अहम हिस्सा बताया।
नई दिल्ली। मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दिल्ली में हो रहे प्रदर्शनों और शांतिपूर्ण विरोध को लेकर वरिष्ठ साहित्यकार गीतांजलि श्री ने लोकतांत्रिक अधिकारों और संवैधानिक मूल्यों पर महत्वपूर्ण सवाल उठाए हैं। उन्होंने कहा कि यदि शांतिपूर्ण और न्यायपूर्ण प्रतिरोध का आयोजन तक नहीं करने दिया जाएगा, तो लोकतंत्र की रक्षा कैसे होगी?
गीतांजलि श्री ने अपने विचारों में कहा कि लोकतंत्र की रक्षा केवल उन लोगों की जिम्मेदारी नहीं है, जो गलत के खिलाफ आवाज उठाने के लिए सड़कों पर उतरते हैं, बल्कि सुरक्षाकर्मियों और अधिकारियों की भी उतनी ही जिम्मेदारी है। उन्होंने सवाल उठाया कि क्या विरोध प्रदर्शनों को रोकने के आदेशों के बीच जिम्मेदार अधिकारियों का विवेक उन्हें अपने कर्तव्यों पर विचार करने के लिए प्रेरित नहीं करता?
उन्होंने कहा कि जनता अपने बुनियादी अधिकारों और संवैधानिक हकों को लेकर चिंतित है। ऐसे में लोगों का अपनी बात रखना और सवाल उठाना लोकतांत्रिक व्यवस्था का महत्वपूर्ण हिस्सा है। सरकार को अपनी गलतियों को स्वीकार कर उन्हें सुधारने की जरूरत है। ऐसा करना देश के हित में भी है और सरकार के अपने हित में भी।
गीतांजलि श्री के अनुसार, जब लोगों की चिंताओं और अधिकारों से जुड़े मुद्दों पर संतोषजनक समाधान नहीं निकलता, तो विरोध की आवाज उठना स्वाभाविक है। उन्होंने शांतिपूर्ण प्रतिरोध के अधिकार को लोकतंत्र की मजबूती से जोड़ते हुए कहा कि असहमति और विरोध के लिए लोकतांत्रिक स्थान बनाए रखना आवश्यक है।
लोकतंत्र में असहमति का महत्व
इस पूरे मामले ने शांतिपूर्ण प्रदर्शन, अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और संवैधानिक अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस को सामने ला दिया है। लोकतांत्रिक व्यवस्था में विरोध और असहमति को किस तरह स्थान दिया जाए, यह सवाल नागरिकों, प्रशासन और सरकार—सभी के लिए महत्वपूर्ण है।
नोट: यह समाचार उपलब्ध कराई गई सामग्री के आधार पर तैयार किया गया है।
सूर्या जागरण न्यूज 24 डिजिटल मीडिया संस्थान — संस्थापक सूरज जायसवाल।


